Wednesday, December 31, 2014

प्रवेश

भारत साम्राज्य के लिए बहुत बड़ा दिन तो था ही - ठीक पच्चीस साल पहले हमारे मुख्य प्रशासक नेताजी बोस के आज़ाद हिन्द फ़ौज, बर्मा से आते हुए अंग्रेज़ों को भारत से निष्कासित किया था। ऐसे ऐतिहासिक दिन पर राजधानी कलकत्ता फूलों से ढका हुआ था।

हम सब थे वहाँ पर कार्यक्रम को देखने और फॉरवर्ड ब्लॉक, नेताजी के एवं भारत के एकमात्र शासक दल, के आधिकारिक अख़बार जनगर्जन में लिखने के लिए।  वास्तव में बहुत ही कम लोग इसे देख पाते क्योंकि केवल दल और विदेशी मेहमानों को ही आने की अनुमति थी।  हम तो इसलिए आ पाये क्योंकि हम देश के एकमात्र अख़बार के पत्रकार थे और  हम से ही कल लोग इसके बारे में पढ़ते - जनगर्जन  का ग्राहक बनना  सब के लिए अनिवार्य थ।  फिर भी, हमें इस दिन के लिए विशेष प्रशिक्षण करना पड़ा: गलती से भी दल के बारे में कुछ बुरा लिखना राज-द्रोह माना जायेगा। परन्तु उस दिन जो हुआ, उसे हम भी अच्छे दायरे से नहीं लिख पाते।

फ़ौज के २ मणिपुर पलटन के जवान बैठे हुए नेताजी एवं विशेष मेहमान जर्मनी के अडोल्फ़ हिटलर और जापान के हिरोहीतो को सलामी कर रहे थे जब अचानक से गोली की आवाज़ सुनाई दी।  अव्यवस्था में सब गोली मारने वाले को ढूंढने लगे पर किसी ने यह नहीं देखा कि गोली लगी किसे - जब नेताजी ज़मीन पर गिरे तब ही सब ने उनके सर में बनी हुई छेद देखी।

हमारे नेताजी का हत्याकांड हुआ था। साम्राज्य में आपातकाल घोषित किया गया। काबुल और लंका में अलगाववादियों ने मौका देख आज़ादी कि मांग उठाई। अनंतिम प्रशासक अज़ीज़ अहमद ने एक ही बात कहा - किसी भी हालत में, देश का विभाजन नहीं होगा। परन्तु नेताजी के हत्या के बाद, देश टूटने पर आ गया था।

(निरंतर …)

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