Wednesday, December 31, 2014

अन्वेषण

की हत्यारा फ़ौज का कोई था इस पर कोई संदेह नहीं था - गोली इतने सही रूप से मारना की केवल एक ही इन्सान को लगे, वह भी ठीक सर पर, और कोई हत्यारे को देखे भी न? हाँ, यह हो सकता था कि लक्ष्य नेताजी नहीं थे, पर कोई मानने को तैयार नहीं था। गलती से इतना सही निशाना?

परन्तु फ़ौज पर अन्वेषण करना  खतरनाक था - काबुल और लंका के साथ, पंजाब और मद्रास में भी अलगाववादियों के गतिविधियाँ बढ़ने लगी।  फ़ौज के अलावा कोई भी देश को एक नहीं रखा पाता।  पंद्रह साल पहले, जब फ़ौज के कुछ अधिकारीयों ने  तख्तापलट करने की कोशिश की थी, नेताजी ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई थी, जिससे फ़ौज के कुछ पल्टन में ग़दर की पुकार  बढ़ने लगी। इस बार मामले को और ध्यान से देखना पड़ता प्रशासक अज़ीज़ को।

परन्तु एक बात किसी को अभी भी समझ में नहीं आई - कोई फौजी नेताजी का हत्याकांड करके साशन को हथियाने कि कोशिश क्यों नहीं की?  नेताजी का उत्तराधिकार योजना ठीक से चली, तो क्या प्रशासक अज़ीज़ ने ही हत्याकांड योजना बनाया था? या फिर क्या प्रतिबन्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के किसी युद्धकारी का काम था? अतः, क्या प्रशासक के जान को ख़तरा था? कलकत्ता में दोनों सिद्धांतों को मानने वाले आपस में बातचीत कर रहे थे। बाकी देश अलगाववादी आग में जल रहा था।

हत्याकांड के कुछ दिनों बाद प्रशासक अज़ीज़ अचानक से कुछ कांग्रेस युद्धकारियों को फांसी पर चढ़ाई - एक गुप्त परिक्षण में उन्हें दोषी पाया गया था।  हम पत्रकारों ने तो यही लिखा था, परन्तु सब को लगा था कि परिक्षण इतना गुप्त था कि प्रशासक के अलावा किसी को भी इसके बारे में पता नहीं था! परन्तु इससे फ़ौज में फिर से ग़दर कि  आहट बढ़ने लगी - फ़ौज अधिकारीयों को लगा की प्रशासक हत्याकांड को दफ़नाना चाहते थे।

इसी बहस में काबुल ने आजादी घोषित की। देश अब सही मायने में विभाजित होने लगा।

(निरंतर)

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