Wednesday, December 31, 2014

क्रांति

प्रशासक कह रहे थे की कांग्रेस के लोगो ने नेताजी का हत्याकांड किया था, परन्तु फ़ौज यह बात मानने को तैयार नहीं थी। कलकत्ता में बहस चल रहा था और काबुल में विभाजन। भारत साम्राज्य में अँधेरा फैलने लगा। कुछ लोग प्रशासक के तरफ ऊँगली उठाने लगे - और उन्हें कारागार में डाला गया।

हत्याकांड के ठीक दो हफ्ते बाद, कुछ अजीब होने लगा। फॉरवर्ड ब्लॉक के एक अनजान नेता को रक्षा मंत्री बनाया गया, सारे वरिष्ठ नेताओं के ऊपर। प्रशासक के इस निर्णय से नेता तो गुस्सा थे, लेकिन फ़ौज बहुत ही खुश था। काबुल में अलगाववादियों को पकड़ा गया, मद्रास में द्रोही सुब्बीर अइयर को गिरफ्तार किया गया। सब इतने तेज़ रफ़्तार से हुआ कि कुछ दिन बाद मानो कुछ हुआ ही न हो !

हत्याकांड के ठीक एक महीने बाद, सब फिर से बिगड़ने लगा।  हत्याकांड के लिए मुख्य प्रशासक अज़ीज़ एवं फॉरवर्ड ब्लॉक के वरिष्ठ नेताओ को फ़ौज ने गिरफ्तार किया। एक आतंरिक जांच में उन्हें दोषी पाया गया। मामला इतना जटिल था कि किसी को पता नहीं था सच क्या था और झूठ क्या था - लोग स्थिरता चाहते थे। उसी श्याम, फ़ौज ने साम्राज्य के संविधान को विलय किया।  रक्षा मंत्री, जो एकमात्र नागरिक नेता इस सब में बचे, ने घोषित किया कि भारत साम्राज्य को एक गणतंत्र में पुनर्निर्माण किया जायेगा।

एक साल बाद, नेताजी के हत्याकांड के पहले सालगिरह पर, पुराने प्रशासन के रक्षा मंत्री ने भारत गणराज्य के पहले राष्ट्रपति की शपथ ली :

"मैं, सरदार वल्लबभाई पटेल, भगवान के नाम पर भारत गणराज्य के राष्ट्रपति बनने का शपथ लेते हुए… "

(समाप्त)

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